Sunday, 24 January 2016

Zindagi

           "ज़िन्दगी"


कभी फूलों सी मेहकती हैं,
कभी काँटों सी चुबती हैं,
कभी चुपके से रोती हैं,
का ही खुलकर ये हँसती हैं;

कभी शर्माती हैं,
कभी इठलाती हैं,
कभी साथ चलते चलते,
यूँही रूठ जाती हैं;

सपने ये दिखाती हैं,
हिम्मत ये जगाती हैं,
कभी गिराना भी जानती हैं,
तोह संभलना भी येही सिखाती हैं;

नाचती हैं,
गुनगुनाती हैं,
अपने ही सुरों से,
संगीत ये सजाती हैं;

मुश्किलें कितनी भी हो,
हारना नहीं जानती हे ये,
बिखरे हुये तिनके से,
महाल बनाना जानती है ये;

चाहे कैसी भी हो,
हर किरदार ये निभाती हैं,
दुनीया के इस रंगमंच पर,
ज़िन्दगी....बस चलती जाती है;
               
             -मुकेश(AEM KAY)कुमरे.

1 comment: