संभले थे कभी,
गिर अब पड़े हैं,
जवाबो को खोजते,
प्रश्नो का जाल बुन चले हैं;
अभिमानी थे कभी,
मज़ाक तो अब बना हैं,
गैरो पे हस्ते थे कभी,
सीने का दर्द अब पता चला हैं;
सरहदे पार गए थे,
सरहदे मुल्ख में बना गये,
स्वाभिमान से जो लौ जलाई थी कभी,
आज उसे ही बुझा गये;
खोजने खुद को गये थे,
अंतर्मन खो आये,
क़र्ज़ जिस माटी का था,
उसे ही छोड़ आये.
-AEM KAY.
गिर अब पड़े हैं,
जवाबो को खोजते,
प्रश्नो का जाल बुन चले हैं;
अभिमानी थे कभी,
मज़ाक तो अब बना हैं,
गैरो पे हस्ते थे कभी,
सीने का दर्द अब पता चला हैं;
सरहदे पार गए थे,
सरहदे मुल्ख में बना गये,
स्वाभिमान से जो लौ जलाई थी कभी,
आज उसे ही बुझा गये;
खोजने खुद को गये थे,
अंतर्मन खो आये,
क़र्ज़ जिस माटी का था,
उसे ही छोड़ आये.
-AEM KAY.