Tuesday, 24 May 2016

बंजारा मन

24/05/16.                          12:30 am


चल पड़े है हम,
जहा हवाओँ का रुख हैं,
कल ना कोई अता पता ,
क्योंकि बंजारा ये मन हैं ,


राह चलते ज़िन्दगी के,
 कई रूप देखे,
कई हस्ते चेहरे,
तो कुछ हालातो से हारे;

कुछ मिले जिनके हौसलें बुलंद थे,
आँखो में भड़कती ज्वाला,
पर मन से वे शीतल थे;

बातें कुछ की लाजवाब थी,
सब कुछ करने की चाह थी,
पर जागते सपनों के मारे बिचारे,
बस बातों में ही मस्त थे;

कही बरसते शोले थे,
कही थी पेड़ों की निर्मल छाया,
कही थी धरती की हरी चादर,
जो मन को खुप भाया;

कही लोगों का शोर था,
एक नहीं चारो ओर था,
उसी बीच चिड़ियों का चहकना,
कानों को मधुर संगीत था;

दिन भर की थकान से,
जब शरीर हमारा सुलगता,
बस फिर चाँद लोरी सुनाकर,
मीठी गहरी नींद दिलाता;

फिर कदम चल पड़ते हैं,
नई कहानी बतलाते हैं,
कल का ना अता पता,
क्योंकि बंजारा ये मन हैं;

                        -  AEM KAY

No comments:

Post a Comment