Friday, 28 April 2017

karz

संभले थे कभी,
गिर अब पड़े  हैं,
जवाबो को खोजते,
प्रश्नो का जाल बुन चले हैं;

अभिमानी थे कभी,
मज़ाक तो अब बना हैं,
गैरो पे हस्ते थे कभी,
सीने का दर्द अब पता चला हैं;

सरहदे पार गए थे,
सरहदे मुल्ख में बना गये,
स्वाभिमान से जो लौ जलाई थी कभी,
आज उसे ही बुझा गये;

खोजने खुद को गये थे,
अंतर्मन खो आये,
क़र्ज़ जिस माटी का था,
उसे ही छोड़ आये.

                -AEM KAY.

2 comments:

  1. tu ek din bohot bada poet banega bhai......

    kash tujhe...itni sari teri poems rato rat mushhoor ho jaye

    ReplyDelete
  2. one of wonderful....written...

    ReplyDelete